Wednesday, March 4, 2009

" जी का खेल "

बहुत पहले डॉ सरोजिनी प्रीतम की यह लाइन पड़ी थी की " जहा जी लग जाए वह जी न लगाये "
इसका अर्थ पुरी जिंदगी में बहुत बार समझ आया ,सोरोजिनी "जी" ने बहुत ही सही कहा है ।
अब देखिये कल ही मुझे एक फ्रेंड ने कहा बताया की उसकी बॉस उसके साथ बहुत ही फ्री है उसको हर बात बता देती है मैंने कहा वोह सब तो ठीक है बस एक बात ध्यान रखना " जहा जी लग जाए वह जी न लगना "
अब आप में से जो समझदार है उनको तो इसका मतलब समझ आ ही गया होगा पर जो जायदा समझदार है उनके लिए बता दू की क्योकि बॉस के साथ जायदा मेल जोल भी ठीक नही है जब कोई आप से बहुत खुल जाता है तो उसका आप पर बहुत हक हो जाता है वोह आप से कुछ भी बोल सकता है कुछ भी करवा सकता है तो जरुरी है की बॉस से तो दुरी ही बना कर रखी जाए । बाकि तो फिर आप की मर्जी ...

यह तो हुआ जी का पहला अर्थ , अब दूसरा अर्थ देखिये -
अगर आप किसी से बहुत प्यार करते है उसको दिल से कहते है तो फिर कोई भी फोर्मलिटी मत कीजिये बहुत ड्रामा मत कीजिये दिखावा लगता है । अब देखिये मैंने बहुत साड़ी महिलाओ को देखा है तो पति को रिझाने के लिए हा जी यह जी कर कर के बात करती है पर पीठ पीछे वही महिलाये पतियों की बुराई करने में पीछे नही रहती है के मतलब है " जी" लगाने का । डरती तो आप है नही फिर यह डरने का यह आदर करने का ड्रामा किस लिए ?
खैर महिलाओ का और महिलाओ का ही नही आदमियों का भी बहुत बार यही काम होता है झूठी तारीफ करने का या फिर हा में हा मिलाने का और पीछे से क्यू करने में बी रहने का ॥
तो भिया समझ गए न आप सब लोग याद रखना " जहा जी लग जाए वह जी न लगाना "

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